हनोल मंदिर के बारे में जानकारी | Hanol temple history in hindi

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hanol temple history in hindi

हनोल मंदिर के बारे में जानकारी | Hanol temple history in hindi

1. यह उत्तराखंड  देहरादून जनपद के जौनसार बावर में स्थित टोंस नदी के तट पर बसा हुआ है जो भगवान शिव को समर्पित है।

2.  उतराखंड के जौनसार  बाबर में स्थित इस मंदिर को (पांचवे धाम) के रूप में दर्जा दिया गया है।

3. हनोल महासू देवता मंदिर का निर्माण हूण राजवंश के पंडित मिहिरकुल हूण ने करवाया था यह मंदिर हूण स्थापत्य शैली में बना हुआ है।

4. यह मंदिर 4 देवताओं का सामूहिक रूप है जिसमें चार भाइयों के नाम बासिक, पवासी , चलदा , महासू यहा  मुख्य रूप से बौटा महासु का है  जिसे केलू वीर भी कहा जाता है ।

5. हानोल  का प्राचीन नाम चकरपुर था  यह मंदिर यह तीन कक्षाओं में बटा हुआ है।

6. हनोल मंदिर जौनसार बाबर के लोगों का सबसे बड़ा तीर्थ स्थल माना जाता है यह विश्वभर में प्रसिद्ध है ।

7. इस मंदिर को उत्तराखंड सरकार ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया है।

8.  यह मंदिर देहरादून से लगभग 190 किलोमीटर और मसूरी से 156 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।

9.  इस मंदिर के गृह गर्भ में पानी की एक धारा भी निकलती है, लेकिन वह कहां जाती है इसके बारे में किसी को भी अभी तक  पता नहीं है यहा जो भी व्यक्ति मनोकामना करता है वो पूरी हो जाती है।

10.  इस मंदिर के गृह गर्भ में भक्तों का जाना मना है। केवल पुजारी ही मंदिर में प्रवेश कर सकता है। इस मंदिर में  एक ज्योत है जो  हमेशा अपने आप जलती रहती है।

 

हनोल मंदिर की शैली | Hanol temple history in hindi

11. आपको बता दे की महासू देवता जौनसार बावर, हिमाचल प्रदेश के ईष्ट देव हैं। यहां हर साल  इस मंदिर के लिए दिल्ली से (राष्ट्रपति भवन) से नमक की भेंट आती है।

12.   पांडव लाक्षा ग्रह( लाख का महल) से निकलकर यहां आए थे। हनोल मंदिर लोगों के लिए तीर्थ स्थान के रूप में है  इस मंदिर को न्यायाधीश कहा जाता है

13. ऐसी मान्यता है कि यह पर  किरमीर दानव ने हुणभाट के साथ पुत्रों मर दिया था  हुनाभाट ने हनोल मंदिर का निर्माण किया तब भगवान शिव ने इस दानव का वध किया ।

14. मैंद्रथ नामक स्थान पर बासिक महासू की पूजा की जाती है जिससे कपला वीर के नाम से भी जाना जाता है।

15. इस मन्दिर के पुजारी श्री सूरतराम जोशी और मन्दिर समिति सदस्य श्री बलिराम शर्मा है।

16.  मन्दिर में प्रसाद के रूप में आटा और गुड़ चढ़ाया जाता है जिसे स्थानीय भाषा में लोग  “कढ़ाह” कहते हैं। कढ़ाह के साथ 24 रूपये की भेटं भी चढ़ाई जाती है। कई श्रद्धालु मन्दिर में बकरा भी अर्पित करते है।

 

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